समानता, अहिंसा, विकेंद्रीकरण, लोकतंत्र और समाजवाद.. ये पांचों भारत की समग्र राजनीति के अंतिम लक्ष्य है...

- डॉ राम मनोहर लोहिया


लोहिया-भगत व समाजवाद

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- दीपक मिश्र

हम आजादी के बाद शोषण विहीन समतामूलक समाजवादी भारत की स्थापना करना चाहते हैं| यही हमारी लड़ाई का उद्देश्य है|

- भगत सिंह

भगत सिंह व रामनोहर लोहिया की सादृष्यतायें और समाजवाद

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट आर्मी के सूत्रधार शहीद- ए--आजम भगत सिंह और महान क्रांतिधर्मी समाजवादी चिन्तक डा० राम मनोहर लोहिया के व्यक्तित्व. सोच. कार्य प्रणाली तथा जीवन- दर्शन में कई समानतायें एवं सादृश्यतायें दृष्टिगत हैं । भगत सिंह के स्वप्न एवं डा0 लोहिया की सैद्धांतिक अवधारणायें व्यापक दष्टिकोण से देखने में एक ही रूप व रंग के प्रतीत होते हैं । दोनों का सैद्धान्तिक साध्य ऐसे समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना थी जिसमें कोई व्यक्ति किसी का भी शोषण न कर सके। कई घटनायें, व्यक्ति और प्रेरक तत्व ऐसे हैं जो दोनों के जीवन में उभयनिष्ठ हैं । इसे महज मणिकांचन संयोग नहीं कहा जा सकता कि जिस तिथि को नियति ने भगत सिंह को शहादत दी, उसी दिन डा0 राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ। दोनों अप्रतिम विभूतियों को एक तल के दो सागर कहना गलत न होगा। भगत सिंह ने समाजवादी आंदोलन को जहां छोड़ा, वही स्थान डा० लोहिया के लिए प्रस्थान बिन्दु बना।

सर्वविदित है कि 23 मार्च को 1931 को 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह को सुखदेव व राजगुरु के साथ फांसी दी गई थी तो स्वर्णाक्षरों में अंकित करने योग्य तथ्य है कि इसी दिन 1910 में प्रातःकाल तमसा नदी के तट पर अकबरपुर में लोहिया का जन्म हुआ था । इनके पिता हीरालाल लोहिया और माता का नाम चन्दा था। भगत सिंह और डा० लोहिया में मात्र 3 साल का अंतर था। एक ही काल-खण्ड में पैदा होने और समवय होने के कारण मनोवृत्तिगत समानता होना स्वाभाविक है l देश-भक्ति और त्याग दोनों को विरासत में मिली । लोहिया के पिता जहां प्रतिबद्ध गांधीवादी और सत्याग्रही थे, वहीं भगत सिंह के पिता किशन सिंह पंजाब के प्रमुख आंदोलनकारियों में अग्रगण्य थे l जब भगत सिंह 27 सितम्बर 1807 को बंगा, लायलपुर में पैदा हुए उनके पिता जेल में थे । 1945 में जब डा० लोहिया आगरा में बंदी थे तब उन्हें उनके पिता की मृत्यु का दुःखद समाचार प्राप्त हुआ। दोनों अपने पिता की अंत्येष्टि में शामिल नहीं हो पाये। भगत सिंह फांसी पर चढ़ चुके थे और लोहिया कारागार में थे। डा० लोहिया तमाम आग्रहों के बावजूद अपना जन्म दिवस भगत सिंह का शहादत दिवस होने के कारण नहीं मनाते थे, इससे पता चलता है कि भगत सिंह के प्रति लोहिया के मन में अथाह व अनिर्वचनीय सम्मान था । बहुत कम लोग जानते हैं कि राममनोहर लोहिया को प्रथम बार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता जिस घटना क्रम के कारण मिली, उसके मूल में शहीदेआजम भगत सिंह ही थे। 1931 में भगत सिंह को फांसी देने की खबर डा0 लोहिया को जर्मनी में मिली । वे वहां उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। भगत सिंह के बलिदान से लोहिया का अंतस् ब्रिटानिया हुकूमत के प्रति आक्रोश की भावना से पूरी तरह भर चुका था। 1931 में ही लीग आफ नेशन्स के अधिवेशन के दौरान डा0 लोहिया ने भारत में हो रहे अंग्रेजी सरकार के दमन चक्र और भगत सिंह को दी गई फांसी के बाद हुकूमत के खिलाफ बने माहौल और क्रोध से दुनिया के प्रतिनिधियों को अवगत कराने का निर्णय लिया। एक सामान्य विद्यार्थी के लिए लीग आफ नेशन्स के प्रेक्षागृह में पहुंचना आसान कार्य नहीं था। डॉक्टर लोहिया ने किसी तरह अपने अभिन्न मित्र व सहपाठी गोवा के मूल निवासी जोलियो मेनेजिस और अपने लिए दो पास की व्यवस्था कर ली। जैसे ही गुलाम भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे बीकानेर के महाराज गंगा सिंह ने ब्रिटानिया सल्तनत की कसीदागोई शुरू की, दर्शक दीर्घा में बैठे लोहिया विलक्षण कुहूक के साथ सीटी बजाने लगे। इस अनपेक्षित एवं आकस्मिक घटनाक्रम पर सभा के अध्यक्ष रूमानिया के टिटेलेस्क्यू समेत सभी हतप्रभ थे। लोहिया और मेनेजिस को सभागृह निकालने का आदेश दिया गया, किन्तु जाते-जाते डा0 लोहिया बीकानेर के महाराज के झूठ को बेपर्दा' करने में सफल रहे। दूसरे दिन डॉक्टर लोहिया ने लीग आफ नेशंस के अध्यक्ष नाम तक खुला पत्र ( जिसमें धरासणा में किए गए अत्याचार और भगत सिंह को दी गई फांसी का विस्तृत विवरण था) लिखा। साम्राज्यवादी ताकतों का कच्चा चिट्ठा छापने का साहस सिर्फ लू-त्रावे-हयूमेनाइट नाम के एक अखबार ने किया। इस अखबार की अनेकानेक प्रतियां खरीद कर लोहिया ने सभी प्रतिनिधियों को अध्ययनार्थ बांटा। यह घटना भगत सिंह द्वारा असेम्बली में फेंके गये बम और वितरित किए गए पर्चे जैसी ही थी। दोनों घटनाओं से दोनों विभूतियों में से एक सी मेधा, सोच और कार्यप्रणाली परिलक्षित होती है। इस घटना से यूरोप और एशिया के राजनीतिक कार्यकर्ताओं तथा क्रांतिकारियों में डा0 लोहिया की एक अलग व विशिष्ट पहचान बनी। देखते ही देखते कटिबद्ध साम्राज्यवाद विरोधी सोच के कारण लोहिया भगत सिंह की तरह समाजवादियों और देशभक्तों के चहेते बन गये।

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- भगत सिंह - लोहिया व समाजवाद

सर्वविदित है कि 23 मार्च, 1931 को सात बजकर 33 मिनट पर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसिएशन के सूत्रधार भगत सिंह ने देश रक्षा के लिए अपने प्राणों को त्याग दिया था, इसी तिथि को 1910 में क्रांतिधर्मी व चिंतक राममनोहर लोहिया ने गांधीवादी हीरालाल और चंदा देवी के घर में पुत्र के रूप में जन्म लिया था। इन दोनों महापुरुषों के व्यक्तित्व, कार्य-प्रणाली, सोच एवं जीवन-दर्शन में कई समानताएं दृष्टिगत हैं। दोनों का सैद्धान्तिक लक्ष्य एक ऐसे शोषणविहीन, समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना का था जिसमें कोई व्यक्ति किसी का शोषण न कर सके और किसी प्रकार का अप्राकृतिक अथवा अमानवीय विभेद न हो। लोहिया, भगत सिंह को अपना आदर्श मानते थे, जब उन्हें फांसी हुई तो लोहिया न इसका प्रतिकार लीग आॅफ नेशन्स की जेनेवा बैठक के दौरान सत्याग्रह कर किया था। भगत की शहादत के कारण ही लोहिया 23 मार्च को अपना जन्म दिन मनाने से अनुयायियों को मना करते थे। भगत सिंह व लोहिया दोनों मूलतः चिंतनशील और पुस्तकों के प्रेमी थे। भगत सिंह ने जहां चन्दशेखर आजाद की अगुवाई में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसिएशन का गठन किया था, वहीं लोहिया ने आचार्य जी की अगुवाई में 1934 में गठित कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के पार्टी के सूत्रधार बने। दोनों ने समाजवाद की व्याख्या स्वयं को प्रतिबद्ध समाजवादी घोषित करते हुए किया। ...

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Ambassador Of Socialism | Dr. Rammanohar Lohia

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